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पेट के घाव

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पेट के घाव पाचनतंत्र के रास्ते की दीवार में ज्वालामुखी के मुख जैसे बनते हैं जो जठरीय स्राव के सम्पर्क में रहते हैं। ये घाव तब उत्पन्न होते हैं जब आम श्लैष्मिक सुरक्षा तत्व अव्यवस्थित हो जाते हैं या अम्ल और पेप्सिन जैसे कोटरिय कारणों की उग्रता से दब जाती है। ये घाव कभी-कभी आहार नली के निचले भाग में विकसित होते हैं, लेकिन अधिकतर पेट के कम वक्रता वाले भागों पर बनते हैं, जहां उन्हें जठरीय घाव कहते हैं। जब यह घाव ड्यूडनम के पहले भाग में होते हैं, तब इसे ड्यूडनम अल्सर कहते हैं।

कारण-
में घाव बनने का मुख्य कारण पेट व ड्यूडनम की श्लैष्मिक दीवार द्वारा भेजे जाने वाली सुरक्षा तथा ड्यूडनम के रसों की काम करने की क्षमता का कम होना तथा उसके शक्ति क्षमता से अधिक मात्रा में जठरीय रस का स्राव होना है। जठर रस के सम्पर्क में आने वाले जठरांत्र मार्ग के सभी भाग आहार नली के निचले श्लैष्मिक ग्रंथियों, पेट की श्लैष्मिक कोष की परत, जठरीय ग्रंथियों की श्लैष्मिक झिल्ली के कोष, मुख्य रूप से श्लेष्मा का स्राव करने वाली जठर निर्गम की गहरी ग्रंथियां और अंतत: उच्च क्षारीय श्लेष्मा का स्राव करने वाली ड्यूडनम की ऊपरी ग्रंथियों तक होता है।

शरीर में अम्लता की मात्रा को बढ़ाने वाले पदार्थ है जैसे- धूम्रपान, अल्कोहल, कॉफी, एस्पिरीन, कुछ औषधियां तथा वेगस स्नायु की अधिक उत्तेजना व उत्तेजक भावनाएं हैं। यह रोग पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में कम पाया जाता है। अल्सर किसी भी अवस्था में हो सकता है परन्तु ड्यूडनल अल्सर अधिकतर 30 से 55 वर्ष के बीच की आयु वाले व्यक्ति में होता है। जठरीय अल्सर अधिकतर 55 से 70 वर्ष के बीच की आयु वाले व्यक्तियों में अधिक पाया जाता है। धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों तथा लम्बे समय तक जलन को दूर करने वाली दवा लेने से अल्सर होता है!

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