सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पेट के घाव

💦

पेट के घाव पाचनतंत्र के रास्ते की दीवार में ज्वालामुखी के मुख जैसे बनते हैं जो जठरीय स्राव के सम्पर्क में रहते हैं। ये घाव तब उत्पन्न होते हैं जब आम श्लैष्मिक सुरक्षा तत्व अव्यवस्थित हो जाते हैं या अम्ल और पेप्सिन जैसे कोटरिय कारणों की उग्रता से दब जाती है। ये घाव कभी-कभी आहार नली के निचले भाग में विकसित होते हैं, लेकिन अधिकतर पेट के कम वक्रता वाले भागों पर बनते हैं, जहां उन्हें जठरीय घाव कहते हैं। जब यह घाव ड्यूडनम के पहले भाग में होते हैं, तब इसे ड्यूडनम अल्सर कहते हैं।

कारण-
में घाव बनने का मुख्य कारण पेट व ड्यूडनम की श्लैष्मिक दीवार द्वारा भेजे जाने वाली सुरक्षा तथा ड्यूडनम के रसों की काम करने की क्षमता का कम होना तथा उसके शक्ति क्षमता से अधिक मात्रा में जठरीय रस का स्राव होना है। जठर रस के सम्पर्क में आने वाले जठरांत्र मार्ग के सभी भाग आहार नली के निचले श्लैष्मिक ग्रंथियों, पेट की श्लैष्मिक कोष की परत, जठरीय ग्रंथियों की श्लैष्मिक झिल्ली के कोष, मुख्य रूप से श्लेष्मा का स्राव करने वाली जठर निर्गम की गहरी ग्रंथियां और अंतत: उच्च क्षारीय श्लेष्मा का स्राव करने वाली ड्यूडनम की ऊपरी ग्रंथियों तक होता है।

शरीर में अम्लता की मात्रा को बढ़ाने वाले पदार्थ है जैसे- धूम्रपान, अल्कोहल, कॉफी, एस्पिरीन, कुछ औषधियां तथा वेगस स्नायु की अधिक उत्तेजना व उत्तेजक भावनाएं हैं। यह रोग पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में कम पाया जाता है। अल्सर किसी भी अवस्था में हो सकता है परन्तु ड्यूडनल अल्सर अधिकतर 30 से 55 वर्ष के बीच की आयु वाले व्यक्ति में होता है। जठरीय अल्सर अधिकतर 55 से 70 वर्ष के बीच की आयु वाले व्यक्तियों में अधिक पाया जाता है। धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों तथा लम्बे समय तक जलन को दूर करने वाली दवा लेने से अल्सर होता है!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

**स्वस्थ्य वृद्धावस्था**

बुढ़ापे की अवस्था हर मनुष्य के जीवन का ऐसा अंग है जब अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं. चेहरे से रौनक और शरीर से स्फूर्ति भी चली जाती है. ज्यादातर मनुष्यों में इस अवस्था में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं. ऐसे में उनका मन भी उत्साह हीन हो जाता है. परंतु क्या वास्तव में जीवन का अन्तिम छोर इस प्रकार का होना चाहिए? क्या हम बुढ़ापे की रूपरेखा को बदल नही सकते? शरीर में धीरे-धीरे कमजोरी आने लगती है और चयापचय के कार्य मंद पड़ जाते हैं. चेहरे पर झुर्रियन और रंगत में असंतुलन से धब्बे और झाइयाँ पड़ जातीं हैं. माथे, गालों और गले पर झाइयाँ आना एक आम बात है. बुढ़ापे को लाने में दो कारक विशेष रुप से कार्यरत होते हैं जिनमें से एक बाह्य है और अन्य आंतरिक है. यदि सूर्य के प्रकाश कि तीव्रता वास के क्षेत्र में अधिक है और सूर्य कि किरणों नित्य ही शरीर को दीर्घ समय तक स्पर्श करती हैं तो यह बुढ़ापे को अति तीव्र कर देती है. रेगिस्तान में सूखे क्षेत्र में रहना, गर्म हवाएँ, चिंता, तनाव, धूम्रपान, अनुचित और आवश्यकता से कम भोजन सेवन करना, खारा पानी, व्यायाम ना करना या फिर अधिक ठ...

शोथ अथवा एडीमा का आयुर्वेदिक उपचार

शोथ अथवा एडीमा को आयुर्वेद में शॉफ़ भी कहा जाता है. शोथ शरीर के विभिन्न हिस्सों उत्पन्न हो सकता है जैसे कि चेहरे, आँखों या पिंडलियों में. परंतु कई रोगीयों में यह पूरे शरीर पर पाया जाता है. हालाँकि  अधिकतर स्थितियों में यह सिर्फ़ एक लक्षण मात्र की तरह माना जाता है जहा शरीर के मुख्य अंगों जैसे कि गुर्दे, जिगर, हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क, गर्भाशय आदि में गंभीर विकार उत्पन्न हो रहे हों परंतु फिर भी ये समस्या अपने आप में एक रोग मानी जाती है. अतः प्रधान दोष के अनुसार इसका विमोचन किया जाता है. आयुर्वेद के अनुसार इस रोग का कारण और उनके निदान प्रदान किए गये हैं. शोथ के कारण (Causes Of Swelling In Hindi) यह रोग कई कारणों से उत्पन्न हो सकता है. पंचकर्म: यदि अनुचित अथवा असंतुलित प्रकार से दोषों का विमोचन किया गया हो. किसी प्रकार का ज्वर या बुखार अत्यधिक उपवास रखें से ऋतु अनुसार पथ्य का सेवन ना किया जाए अत्यधिक अम्लीय अथवा अत्यधिक क्षारीय भोजन लेने से यदि अत्यधिक मिर्च-मसालेदार भोजन का सेवन किया जाए. पुरानी लस्सी अथवा दही का सेवन करने से विरुद्धाहार के सेवन से विषाक्...

मुहाँसे त्वचा की सूजन होते हैं,

मुहाँसे सूज जाती हैं और पीप से भर जाती हैं। तैलीय ग्रन्थियों द्वारा सीबम  का अत्यधिक उत्सर्जन मुहाँसों का प्राथमिक कारण है। यहाँ मुहाँसों के उपचार हेतु कुछ सामान्य विधियाँ दी गई हैं: मुहाँसों के उपचार के लिए अधिकतर नीम और तुलसी जैसी पत्तियों का उपयोग किया जाता है।   मुहाँसों को कम करने के लिए उन पर ताज़ी और सूखी पत्तियों का लेप 10 मिनट के लिए लगाएँ, इसे एक सप्ताह में 4-5 बार करें। इनमें निम्बिन नामक सक्रिय तत्व होता है जो संक्रमणरोधी, फफूंदरोधी, ज्वरनाशक होता है और मुहाँसों को नियंत्रित करता है। तुलसी में यूजेनोल होता है, जो कि संक्रमणरोधी और निश्चेतक(antiseptic) होता है,   और यह मुहाँसों के प्रभाव को नियंत्रित करता है। मुहाँसों से छुटकारे के लिए तुलसी के लेप को एक सप्ताह में 4-5 बार लगाएँ। आलू का रस त्वचा पर मंद ब्लीचिंग चमक देता है। मुहाँसों पर 10 मिनट के लिए आलू का रस/कटा आलू/मसला आलू सीधे लगाएँ और फिर धो डालें। आलू में विटामिन-सी, विटामिन-बी6, केरोटिनोइड्स और एंथोसायनिन्स होते हैं जो त्वचा को प्राकृतिक चमक देते हैं।  शहद में मिला हुआ नीबू का रस मुहाँसों को ठीक कर...