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नाभि डिगना या चढ़ना : एक वास्तविक समस्या

नाभि का अपने स्थान से हट जाना, मानव शरीर में अस्वस्थता पैदा कर, कई प्रकार की शारीरिक व्याधियां उत्पन्न करता है, जिनका समाधान नाभि को पुनः यथास्थान पर ला कर ही होता है, औषधियों से नहीं। इस रोग को नाभि खिसकना, नाभि चढ़ना, धरण का टलना आदि नामों से जाना जाता है।
शिशु रूप में जब मानव गर्भावस्था में होता है, तब नाभि ही एकमात्र वह मार्ग होता है, जिसके माध्यम से वह अपनी सभी महत्त्वपूर्ण क्रियाओं, जैसे सांस लेना, पोषक तत्वों को ग्रहण करना तथा व्यर्थ और हानिकारक पदार्थों का निष्कासन करता है। जन्मोपरांत शिशु के गर्भ से बाहर आते ही सबसे पहला कार्य उसकी नाभि और मां के प्लेसेंटा का संबंध विच्छेदन करना तथा शिशु की नाभि-रज्जू को कस कर बांधना होता है।
उदर और आंतों से संबंधित रोगों में, जैसे कब्ज और अतिसार आदि का जब सभी प्रकार के निरीक्षण करने पर भी रोग के कारण मालूम न हों, मल-परीक्षण करने से भी किसी जीवाणु का पता न चले, रोगी में पाचक रस, पित्त और पुनःसरण गति सामान्य हो, लेकिन उसके उदर के शारीरिक परीक्षण में नाभि पर धमनी की तीव्र धड़कन महसूस न हो कर उससे कुछ हट कर प्रतीत होती हो, जबकि सामान्य अवस्था में यह धड़कन नाभि के बिल्कुल मध्य में महसूस होती है और इसके अतिरिक्त रोगी के दोनों स्तनों के केंद्र की नाभि के मध्य से दूरी एक समान न हो कर अलग-अलग होती हो, रोगी के हाथ की दोनों कनिष्ठा अंगुलियों की लंबाई भी समान न हो कर कुछ छोटी-बड़ी मालूम होती हो, जबकि सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति में कनिष्ठा अंगुलियों की लंबाई एक समान ही होती है, तो कुछ विशेष प्रयासों के द्वारा जब नाभि के केंद्र को उसके केंद्र में पुनः स्थापित कर दिया जाता है, तो रोगी को, बिना किसी औषधि उपचार से, इन रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
प्रमुख लक्षण:
नाभि चढ़ना, नाभि खिसकना, धरण का टलना आदि नामों से जाने जाने वाले रोग का सबसे प्रमुख लक्षण तो यही है कि नाभि अपने केंद्र में न हो कर उसके आसपास होती है, जिसके कारण आंत में मल सामान्य गति से आगे नहीं बढ़ता और आंत में अस्थायी अवरोध आ जाने से व्यक्ति को कब्ज रहने लगती है, अंतड़ियों में मल जमा होने लगता है। इसी कारण नाभि का स्थान स्पर्श करने से कठोर प्रतीत होता है।
आंतों में मल के अधिक जमाव से नाभि स्पंदन कुछ मध्यम होता जाता है और रोगी के पेट में भारीपन तथा धीमा दर्द रहने लगता है। कभी-कभी आंत में अवरोध के बजाय उनके अपने विस्थापन, या किसी अन्य अंग के दबाव से आंत में तीव्र उत्तेजना उत्पन्न होने लगती है, जिससे छोटी आंत की पुनःसरण गति तथा बृहत आंत की समूह गति तीव्र हो जाती है। मल पर्याप्त समय तक अंतड़ियों में रुक नहीं पाता है। उसके पोषक पदार्थों एवं जल अंश का अवशोषण न हो पाने से रोगी को मरोड़ के साथ दस्त आने लग जाते हैं। ऐसी स्थिति में आंतें कठोर तो प्रतीत नहीं होतीं, किंतु, उनमें तरल भरा होने के कारण, नाभि की स्पंदन की एक तरंग सी कई स्थानों पर महसूस होता है।
रोगी में अतिसार वाली यह अवस्था यदि अधिक समय तक बनी रहे, तो उसके कारण रोगी के शरीर में विभिन्न पोषक तत्त्वों और जल का अभाव नजर आने लगता है। नाभि प्रदेश में स्थित आंत के किसी भाग के विस्थापन से कई बार उदर में स्थित किसी महत्वपूर्ण अंग को रक्त की आपूर्ति करने वाली रक्त धमनी, अथवा रक्त शिरा पर दबाव पड़ने से वह दबने लग जाती है। ऐसा होने पर उस अंग विशेष की रक्त की पूर्ति घट जाने से उस अंग की कार्यप्रणाली प्रभावित होने लग जाती है तथा तत्संबंधित रोगों का जन्म होता है। यदि उन अंगों से रक्त की निकासी प्रभावित होती है और उन अंगों की विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण उत्पन्न हुए व्यर्थ पदार्थ, रक्त के साथ वापिस न जा कर, उन्हीं अंगों में संचित होने लग जाते हैं। इससे उन अंगों का आकार बढ़ने लगता है और, कई प्रकार के विकार उत्पन्न हो कर, तत्संबंधी रोगों को जन्म देते हैं।
कारण:
नाभि खिसकने के कई कारण हैं, जैसे आचानक चलते समय ऊंची-नीची जगह पर पांव पड़ना, शरीर को संतुलित किये बिना जल्दबाजी में वजन उठाना, ऊंचाई से छलांग लगाना, स्कूटर, कार, बस आदि में सफर करते समय वाहन का कई बार उछलने से झटका लगना। पेट में किसी प्रकार का आघात होना। स्त्रियों में कई बार गर्भावस्था में नाभि पर आंतरिक दबाव से भी नाभि अपने स्थान से हट जाती है।
उपचार:
आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली के अतिरिक्त किसी अन्य चिकित्सा पद्धति ने इसे मान्यता प्रदान नहीं की है। लेकिन जब विशेष प्रकार की तकनीकों से इन रोगों में स्थायी लाभ मिलते देखा जाता है, तब इस रोग की कल्पना को स्वीकार करना पड़ता है।
नाभि को अपने स्थान पर पुनःस्थापित करने के लिए भारत में सैकड़ों विधियां प्रचलित हैं। इनमें से कुछ परीक्षित विधियां इस प्रकार हैं: प्रातः काल एक चम्मच आंवले का चूर्ण, एक गिलास गुनगुने पानी से, अथवा गुनगुने पानी में एक नींबू निचोड़ कर पी लें। यदि शौच विसर्जन की हरकत हो, तो शौच के लिए जाएं, अथवा एक-दो किलोमीटर सैर करने के लिए किसी खुले स्थान, बाग-बगीचे में जाएं। लगभग एक घंटे के उपरांत किसी भी चीज, जैसे पेड़ की शाखा, को दोनों हाथों से पकड़ कर लटक जाएं। लटकने पर पैर जमीन से एक फुट ऊंचें रहें और लटके-लटके पैरों को जोर से चार-पांच बार झटका दंे और पैरों को पूरी शक्ति से जमीन की तरफ खीचते हुए तानें। ऐसा कर के, नीचे उतर कर, लेट जाएं और लेटे-लेटे अपने पेट पर स्वयं के हाथों से, या किसी से मालिश करवाएं। दोनों हाथों की हथेलियों को नाभि पर रखें तथा हल्के दबाव के साथ हाथों को दोनों तरफ फैलाते हुए पसलियों के पास लाएं। फिर, हाथों को बिना हटाए, पसलियों के मध्य जोड़ें तथा हल्के दबाव के साथ सीधे नाभि की तरफ ले जाएं। इस विधि से नाभि अपने स्थान पर स्थित हो जाती है।
श्वसन में लेट कर, पेट पर नाभि के ऊपर जलता हुआ दीपक रख कर, एक लोटा, या गड़वी को उसपर उल्टा रख दें। थोड़ी देर में दीपक बुझ जाएगा और लोटा नाभि क्षेत्र की त्वचा पर चिपक जाएगा तथा त्वचा लोटे में उभर जाएगी। इससे भी नाभि यथास्थान पर आ जाती है।
अन्य उपचारों में रोग के लक्षणों के आधार पर चिकित्सा करें। हल्का व्यायाम, योगासन, या एक्युप्रेशर, कुशल चिकित्सक की देखरेख में, करें।
आहार चिकित्सा:
आंतों की दुर्बलता से यह रोग बार-बार होता है। आंतों को सबल बनाने के लिए फल, सब्जियां भरपूर खाएं। फलो में संतरा, मौसमी, बेल, अनार, तरबूज, नाशपाती, सेब आदि का भरपूर उपयोग करें।
▶ज्योतिषीय दृष्टिकोण:
काल पुरुष की कुंडली में पंचम भाव नाभि का माना गया है। लेकिन अनुभव के अनुसार पंचम भाव में इसका स्थान पंचम भाव के अंतिम अंशों पर है, अर्थात् पंचम और षष्ठ भाव की संधि के निकट। इसलिए पंचम भाव, पंचमेश, पंचम भाव के स्थिर कारक गुरु के साथ-साथ लग्न और लग्नेश जब दुष्प्रभावों में रहते हैं, तो नाभि से संबंधित शारीरिक समस्याएं बनती हैं। इसी तरह सिंह राशि का अंतिम चरण भी नाभि का है, क्योंकि सिंह राशि के स्वामी सूर्य के दुष्प्रभावों में रहने से भी ऐसा रोग हो जाता है।

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