परिचय :
गले के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ मांस की एक गांठ सी होती है, जो लसिका ग्रंथि के समान होती है जिसे टांसिल कहते हैं।
गले के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ मांस की एक गांठ सी होती है, जो लसिका ग्रंथि के समान होती है जिसे टांसिल कहते हैं।
गले में छोटे-छोटे गोल कृत (गोल आकार के) मांसल तन्तु टॉन्सिल कहलाते हैं।
इनमें पैदा होने वाले शोथ (सूजन) को टाँन्सिलाइटिस कहा जाता है।
विभिन्न भाषाओं में नाम
हिन्दी टॉन्सिल।
गुजराती काकरबढवो।
अंग्रेजी टान्सिलाइटिस।
कन्नड़ गण्टालु नोबु।
मलयालम टोण्डा-विकम, टोण्डमुल्लु।
पंजाबी गले दी ग्रिन्थ बढ़ना।
तमिल लशुनाबिव्म, अन्नकु।
तेलगु अंगिटमुल्लु।
अरबी गियालु।
मराठी गल्या चारोग।
कारण :
मैदा, चावल, आलू, चीनी, ज्यादा ठंडा, ज्यादा खट्टी चीजों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग करना टांसिल के बढ़ने का मुख्य कारण है। ये सारी चीजें अम्ल (गैस) बढ़ा देती है। जिससे कब्ज की शिकायत बढ़ जाती है। सर्दी लगने की वजह से भी टांसिल बढ़ जाते हैं। खून की अधिकता, मौसम का अचानक बदल जाना जैसे गर्म से अचानक ठंडा हो जाना, आतशक (गर्मी), हवा का बुखार, दूषित वातावरण में रहने से तथा खराब दूध पीने से भी टांसिल बढ़ जाते हैं।
लक्षण :
गले में सूजन, दर्द, बदबूदार सांस, जीभ पर मैल, सिर में दर्द, गर्दन के दोनों तरफ लसिका ग्रंथियों का बढ़ जाना और उन्हें दबाने से दर्द होना, सांस लेने में परेशानी होना, आवाज का बैठ जाना, हरदम बैचेनी होना और सुस्ती आदि के लक्षण दिखाई देते हैं। इस रोग के होते ही ठंड लगने के साथ बुखार भी आ जाता है, गले पर दर्द के मारे हाथ नहीं रखा जाता और थूक निगलने में तकलीफ महसूस होती है।
भोजन और परहेज :
इस रोग में दूध, रोटी, साबूदाना, खिचड़ी, तोरई और लौकी का पानी, नींबू का पानी, अनन्नास का रस, मौसंबी का रस और आंवले की चटनी का सेवन करना चाहिए।
भोजन में बिना नमक की उबली हुई सब्जियां खाने से टांसिल में जल्दी आराम आ जाता है। मिर्च-मसाले से बने भोजन, ज्यादा तेल की सब्जी, खट्टी चीजें और तेज पद नही लेना चाहीये!
विभिन्न भाषाओं में नाम
हिन्दी टॉन्सिल।
गुजराती काकरबढवो।
अंग्रेजी टान्सिलाइटिस।
कन्नड़ गण्टालु नोबु।
मलयालम टोण्डा-विकम, टोण्डमुल्लु।
पंजाबी गले दी ग्रिन्थ बढ़ना।
तमिल लशुनाबिव्म, अन्नकु।
तेलगु अंगिटमुल्लु।
अरबी गियालु।
मराठी गल्या चारोग।
कारण :
मैदा, चावल, आलू, चीनी, ज्यादा ठंडा, ज्यादा खट्टी चीजों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग करना टांसिल के बढ़ने का मुख्य कारण है। ये सारी चीजें अम्ल (गैस) बढ़ा देती है। जिससे कब्ज की शिकायत बढ़ जाती है। सर्दी लगने की वजह से भी टांसिल बढ़ जाते हैं। खून की अधिकता, मौसम का अचानक बदल जाना जैसे गर्म से अचानक ठंडा हो जाना, आतशक (गर्मी), हवा का बुखार, दूषित वातावरण में रहने से तथा खराब दूध पीने से भी टांसिल बढ़ जाते हैं।
लक्षण :
गले में सूजन, दर्द, बदबूदार सांस, जीभ पर मैल, सिर में दर्द, गर्दन के दोनों तरफ लसिका ग्रंथियों का बढ़ जाना और उन्हें दबाने से दर्द होना, सांस लेने में परेशानी होना, आवाज का बैठ जाना, हरदम बैचेनी होना और सुस्ती आदि के लक्षण दिखाई देते हैं। इस रोग के होते ही ठंड लगने के साथ बुखार भी आ जाता है, गले पर दर्द के मारे हाथ नहीं रखा जाता और थूक निगलने में तकलीफ महसूस होती है।
भोजन और परहेज :
इस रोग में दूध, रोटी, साबूदाना, खिचड़ी, तोरई और लौकी का पानी, नींबू का पानी, अनन्नास का रस, मौसंबी का रस और आंवले की चटनी का सेवन करना चाहिए।
भोजन में बिना नमक की उबली हुई सब्जियां खाने से टांसिल में जल्दी आराम आ जाता है। मिर्च-मसाले से बने भोजन, ज्यादा तेल की सब्जी, खट्टी चीजें और तेज पद नही लेना चाहीये!
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