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**स्वस्थ्य वृद्धावस्था**

बुढ़ापे की अवस्था हर मनुष्य के जीवन का ऐसा अंग है जब अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं. चेहरे से रौनक और शरीर से स्फूर्ति भी चली जाती है. ज्यादातर मनुष्यों में इस अवस्था में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं. ऐसे में उनका मन भी उत्साह हीन हो जाता है. परंतु क्या वास्तव में जीवन का अन्तिम छोर इस प्रकार का होना चाहिए? क्या हम बुढ़ापे की रूपरेखा को बदल नही सकते? शरीर में धीरे-धीरे कमजोरी आने लगती है और चयापचय के कार्य मंद पड़ जाते हैं. चेहरे पर झुर्रियन और रंगत में असंतुलन से धब्बे और झाइयाँ पड़ जातीं हैं. माथे, गालों और गले पर झाइयाँ आना एक आम बात है. बुढ़ापे को लाने में दो कारक विशेष रुप से कार्यरत होते हैं जिनमें से एक बाह्य है और अन्य आंतरिक है. यदि सूर्य के प्रकाश कि तीव्रता वास के क्षेत्र में अधिक है और सूर्य कि किरणों नित्य ही शरीर को दीर्घ समय तक स्पर्श करती हैं तो यह बुढ़ापे को अति तीव्र कर देती है.


रेगिस्तान में सूखे क्षेत्र में रहना, गर्म हवाएँ, चिंता, तनाव, धूम्रपान, अनुचित और आवश्यकता से कम भोजन सेवन करना, खारा पानी, व्यायाम ना करना या फिर अधिक ठंडी और खुश्की के मौसम में रहना.
और दूसरा और महत्वपूर्ण कारण है शरीर का प्राकृतिक रुप से समय के साथ क्षीण होना.

बुढ़ापे के लक्षण (Symptoms Of Ageing Ayurveda Hindi)

  • त्वचा का ढलकना, झुर्रियाँ, धब्बे
  • चेहरे और आसपास के क्षेत्र में महीन रेखयों का आना
  • रोग प्रतिकारक शक्ति में कमी
  • शरीर की ताक़त में गिरावट
  • कमज़ोर हड्डियाँ, मांसपेशियाँ और जोड़
  • रीढ़ की हड्डी में झुकाव
  • कमर का झुक जाना
आयुर्वेदीय उपचार का लक्ष्य केवल बुढ़ापे के लक्षणों को रोकना ही नहीं है अपितु शरीर को नियमित रुप से कार्यान्वित रखना भी है. शरीर में ऊर्जा का उपार्जन कर चित्त को शांत रखना आयुर्वेदीय विधान है.
वास्तव में वात के बढ़ जाने से समय से पूर्व ही बुढ़ापा आ जाता है अधिक उम्र के व्यक्तियों में बुढ़ापा बढ़ जाता है. चिकित्सा पद्धति में आंतरिक अंगों के कार्यशीलता को बढ़ाना और बाहर से लक्षणों की रोकथाम में भी इससे सहायता मिलती है.
जिन लोगों कि त्वचा बाल रूखे और शुष्क होते हैं, समझ लीजिए इनमें वात दोष कि प्रधानता है. आयुर्वेदीय चिकित्सा पद्धति वात, पित्त और कफ तीनो में संतुलन स्थापित करती है. आम तौर पर उपलब्ध औषधीय भोज्य पदार्थ जैसे हल्दी, नीम, शहद और आमला. इन सबके प्रयोग से तथा अंतः कारण में व्याप्त नकारात्मक विचारों को मुक्त करके, मनुष्य एक स्वस्थ और दीर्घ जीवन को प्राप्त करता है.

बुढ़ापे के लक्षण हटाने के कुछ बाहरी साधन (Anti-ageing External Topical Applications For Youthful Skin As Per Ayurveda In Hindi)

  • चंदन कि लकड़ी का तेल, रोज़वुड का तेल, इन दोनों कि बराबर मात्रा में लेकर बराबर मात्रा तिल तेल में इन्हें मिश्रित करें. आप चाहें तो बादाम रोगन में भी इन्हें मिश्रित कर सकते हैं. ये झुर्रियों को हटाने का सर्वश्रेष्ठ साधन है.
  • नींबू के रस की कुछ बूँदें मुख पर लगाने अथवा टमाटर का रस मुख पर लगाने से चेहरे कि त्वचा से दाग-धब्बे गायब हो जाते हैं.
  • यदि आलु और टमाटर का रस लगाया जाए तो इससे चेहरा निखर जाता है. सेब का गुदा मुल्तानी मिट्टी में मिलाकर लगाने से भी चेहरे का रंग निखर जाता है.
  • कुछ बादाम कि गिरियाँ को भिगोकर रखें. इन्हें पीसकर मलाई में मिश्रित कर लें और इस मिश्रण को चेहरे पर लगाएँ. इससे चेहरा निखरा त्वचा मुलायम और तनी हुई बनती है.
  • शहद का प्रयोग करने से चेहरे पर नमी बनी रहती है और इससे अनचाहे बालों से भी छुटकारा मिलता है.

बुढ़ापे को निम्न रखने वाला भोजन (Anti-ageing Dietary Tips As Per Ayurveda In Hindi)

  • फाइबर-युक्त भोजन का सेवन करें. साबुत दालें, चोकर-युक्त आटा, छिल्के वाले चावल.
  • ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स युक्त विभिन्न प्रकार के भोजन जिनमें रंगीन सब्जियाँ जैसे टमाटर, कद्दू, भिंडी, पालक, गाजर, जम्बु इत्यादि शामिल हैं.

कुछ लाभदायक सुझाव (Some Useful Tips For Happy, Youthful LifeAs Per Ayurveda In Hindi)

  • रात्रि को पूर्ण विश्राम करें. 6-8 घंटे कि नींद इसके लिए बहुत ही आवश्यक है.
  • जल का सेवन प्रचुर मात्रा में करें.
  • सूर्य कि किरणों को सीध त्वचा पर ना पड़ने दें.
  • केवल लालिमा लिए हुए सूर्य में प्रातः कल और संध्या में ज़ैदा  ना बैठें. तप्ति धूप में बाहर न निकलें.
  • सदैव प्रसन्नचित्त रहें और मादक पदार्थों के सेवन से ख़ुद को बचाएँ. चाय, काफी के अधिक प्रयोग से त्वचा सूख जाती है.
  • अपनी प्रकृति के अनुसार आयुर्वेदीय परामर्श और चिकित्सलेना भी हितकर है.

    भ्राजक पित्त को प्रदीप्त करना (To Strengthen Bhraajaka Pitta As Per Ayurveda In Hindi)

    भ्राजक पित्त: इसे प्रदीप्त रखने से बुढ़ापे का दुष्प्रभाव शरीर पर नही होता. यह कार्य ऊपर योगाभ्यास एवं आगे बताई गयी औषधियों  के उपयोग  द्वारा सहजता से हो जाता है.
  • पंचकर्म: विश्राम और दो  घंटे तक  विशिष्ट पद्धतियों  द्वारा पुनर्वासन क्रियाएँ का प्रयोग करना चाहिये जिसमें अभ्यंग, शिरोधरा, ऊद्वर्तन, स्वेदना, नास्यम शामिल हैं.
  • योगाभ्यास: नित्यप्रति योगाभ्यास करने से शरीर में प्राण उर्जा का संचार भरपूर मात्रा में रहता है और इससे मस्तिष्क को स्नेहन मिलता है.
  • ब्राहमी: यह औषधि वृद्धावस्था को दूर करने वाली है. इसके सेवन से मन और शरीर दोनों ही तरो-ताज़ा रहते हैं.

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