मधुमेह के रोग के कारण उत्पन्न होने वाली नसों की विकृति को डायबिटिक न्यूरोपैथी कहा जाता है. मधुमेह के रोग के कारण उत्पन्न होने वाली नसों की विकृति को डायबिटिक न्यूरोपैथी कहा जाता है. इस रोग में शरीर के बाहीय अंगों में सुन्न्ता और नसों की कार्यकारी शक्ति का ह्रास होता रहता है. मुख्य रूप से इसमें पाँवों में विकृत संवेदना उत्पन्न होती है. आम तौर पर पाँव मैं झंझनाहट और सुन्न्ता का आभास होता है. काई बार यह पीड़ा अत्यंत तीक्ष्ण और कष्टदायक होती है. जैसे-जैसे समय बीतता है, पाँवों की संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है. इस अवस्था में अगर रोगी के पाँव में कोई घाव उत्पन्न हो जाए तो वह जल्दी ठीक नही होता अथवा बढ़कर नासूर का रूप ले लेता है. स्थिति इतनी विकट हो जाती है जिससे पाँव को काटना पड़ सकता है. शुरू-शुरू में पाँव और टाँगों में कमज़ोरी और चलने में दिक्कत अनुभव होती है. इसके अलावा मधुमेह के कारण तीन अलग प्रकार की नस-विकृति उत्पन्न होती है. थर्ड नर्व पॉल्ज़ी, डायबिटिक अमयोट्रोफ़ी और ऑटनामिक न्यूरोपैथी.
बुढ़ापे की अवस्था हर मनुष्य के जीवन का ऐसा अंग है जब अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं. चेहरे से रौनक और शरीर से स्फूर्ति भी चली जाती है. ज्यादातर मनुष्यों में इस अवस्था में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं. ऐसे में उनका मन भी उत्साह हीन हो जाता है. परंतु क्या वास्तव में जीवन का अन्तिम छोर इस प्रकार का होना चाहिए? क्या हम बुढ़ापे की रूपरेखा को बदल नही सकते? शरीर में धीरे-धीरे कमजोरी आने लगती है और चयापचय के कार्य मंद पड़ जाते हैं. चेहरे पर झुर्रियन और रंगत में असंतुलन से धब्बे और झाइयाँ पड़ जातीं हैं. माथे, गालों और गले पर झाइयाँ आना एक आम बात है. बुढ़ापे को लाने में दो कारक विशेष रुप से कार्यरत होते हैं जिनमें से एक बाह्य है और अन्य आंतरिक है. यदि सूर्य के प्रकाश कि तीव्रता वास के क्षेत्र में अधिक है और सूर्य कि किरणों नित्य ही शरीर को दीर्घ समय तक स्पर्श करती हैं तो यह बुढ़ापे को अति तीव्र कर देती है. रेगिस्तान में सूखे क्षेत्र में रहना, गर्म हवाएँ, चिंता, तनाव, धूम्रपान, अनुचित और आवश्यकता से कम भोजन सेवन करना, खारा पानी, व्यायाम ना करना या फिर अधिक ठ...
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