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सीओपीडी (COPD) का आयुर्वेद द्वारा उपचार

सीओपीडी फेफड़ों
 की घातक बीमारी है जिसमें श्वास नलिकाएँ सूजकर सिकुड जाती हैं. इनकी सूजन में लगातार वृद्धि होती रहती है और कुछ समय बाद फेफड़े छलनी हो जाते हैं जिसे एँफयज़ीमा (emphysema) भी कहते हैं. यह रोग साँस लेने में दिक्कत के अनुभव से शुरू होता है और अंत में पूरे श्वसन तंत्र को प्रभावित कर देता है.

रोग के लक्षण Symptoms of COPD

सीओपीडी श्वसन तंत्र में होने वाले रोगों समूह है जिसमें श्वास की लंबाई में लघुता आ जाती है. इससे शरीर की ऑक्सिजन लेने की क्षमता में कमी आ जाती है तथा carbon-di-oxide की मात्रा खून में बढ़ जाती है. फेफड़ों में जलन की वजह से श्वास नलिकाएँ पिचक जाती हैं.
इस रोग से श्वास नलिकायों में खिचाँव भी उत्पन्न होता है जिससे रोगी को श्वास लेने में कष्ट होता है तथा घबराहट भी महसूस होती है. यह लंबी अवधि तक चलने वाली बीमारी है जिसे पूर्णतयः ठीक नही किया जा सकता परंतु इसे बढ़ने से रोका जा सकता है.

सीओपीडी के कारण (Causes of COPD in Hindi)

सीओपीडी मुख्य रूप से धूम्रपान के सेवन से हो जाता है. दूषित वातावरण में प्रवास करने यह रोग उत्पन्न होता है. अधिक प्रदूषण, वातावरण में कीटनाशक या रंग रोगन के केमिकल्स को श्वास के ज़रिए अंदर लेने से शरीर में इस रोग ला सकती है. अधिक प्रदूषण, वातावरण में कीटनाशक या रंग रोगन के केमिकल्स को श्वास के ज़रिए अंदर लेने से शरीर में इस रोग ला सकती है.इस रोग से ग्रस्त व्यक्तियों को अनेक सावधानियाँ बरतनी चाहिए जिससे वे रिस्क फॅक्टर (risk factors) से दूर रहें. पूर्व लिखित रिस्क फॅक्टर्स के अलावा किचन में उठने वाले धुएं और मसालों की गंध से दूर रहें एवं बत्ती वाले केरोसिन के स्टोव का उपयोग न करें

सीओपीडी  में लाभ देने वाली औषधियाँ (Ayurvedic remedies useful in COPD in Hindi)

सीतोपालदी चूर्ण: यह हर प्रकार की श्वसन संबंधित व्याधि के उपचार में प्रयोग होने वाली औषधि है. यह श्वास नलिकायों की जलन और सूजन को कम करते हुये रोगी को साँस लेने में सहयोग करती है . इसके साथ-साथ यह शरीर की रोग-प्रतिकारक क्षमता को बढ़ाती है.
अकक (Adhatoda vasica): यह श्वसन क्रिया में सहयोग देना वाला और इस तंत्र से संबंधित विभिन्न प्रकार के संक्रमणों को होने से रोकता है.
पुष्करमूल : (Inula racemosa) इस रोग से संबंधित सभी श्वसन संबंधी दिक्कतों से आराम दिलवाने में सक्षम है. यह गाढ़ी, सफेद और हरी तीनो प्रकार की बलगाम (कफ) को निकालने में समर्थ है. यह फेफड़ों में कफ के निर्माण को नियंत्रित करता है और श्वास लेने की क्रिया को भी सहयोग प्रदान करता है.

मुलेठी: (Glycyrhiza glabra) इस औषधि का प्रयोग सूखी खाँसी के उपचार में किया जाता है जब रोगी का कफ आसानी से ना निकलता हो. यह पीली और हरी बलगाम को निकालने में अधिक सहायक् है.
अश्वगन्ध: (Withania somnifera): इस औषधि का प्रयोग इन रोगियों में ताक़त प्रदान करता है और थकावट तथा कमज़ोरी को दूर करता है.
अभ्रक भस्म: इस भस्म के प्रयोग से इस रोग के द्वारा फेफड़ों में और अधिक नुकसान होने से रोका जाता है. इस भस्म के प्रयोग से उस स्थिति में सहयता मिलती है जहाँ श्लेष्मा और कफ को फेफड़ों से निकास बिना किसी रुकावट के हो जाता है. परंतु जहाँ कफ जमा हो और निकलता ना हो, उस स्थिति में इसका प्रयोग नही करना चाहिए अन्यथा कफ सूख कर फेफड़ों में जम जाता है और उनपर अभेद्य परत बना लेता है. परंतु प्रवाल पिशटी और मुलेठी के साथ इसका उपयोग लाभकारी हो सकता है. इस रोग में तीनो औषधियों की मात्रा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि ग़लत प्रयोग से बहुत नुकसान होने की संभावना है.
टंकण भस्म: इस भस्म का प्रयोग सीओपीडी रोग के निवारण में किया जाता है. यह गाढ़ी श्लेष्मा को फेफड़ों से निष्कासित करने में सहयता देता है.
शृंग भस्म: इस भस्म का प्रयोग भी फेफड़ों में जमा श्लेष्मा को निकालने के लिए किया जाता है. यह टंकण भस्म से अधिक शक्तिशाली है तथा इससे छाती में मौजूद कफ को निकालने में सहायता करता है. छाती की दर्द , साँस लेने में दिक्कत और श्वास में आई लघुता को दूर करता है.
यूकलिप्टस आयिल (Eucalyptus oil) के प्रयोग से भी इस बीमारी में लाभ होता है. इस रोग से  monoterpenes  नामक घटक के कारण रोग में लाभ मिलता है.

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