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भोजन और स्वास्थ्य

हमारा भोजन वह आधार है जिससे हमारे शरीर का निर्माण होता है. चरक संहिता के अनुसार किसी भी रोग से मुक्ति के लिए उचित आहार लेने का अत्यंत महत्व है. औषधि के प्रयोग से मिलने वाला लाभ उचित आहार लेने से ही मिल सकता है. सही भोजन लेना औषधि लेने से 100 गुना अधिक लाभदायक है. आचार्य चरक के अनुसार तो अनुचित खानपान ही शरीर में रोग का मुख्य कारण है. आयुर्वेद के अनुसार भोजन बनाते समय देश, काल और प्रकृति तीनों की ओर ध्यान देना परम आवश्यक है. इसके साथ ही साथ व्यक्ति को सभी 6 प्रकार के रसों का सेवन (include 6 tastes to overcome nutritional deficiencies) भोजन में करना चाहिए क्योंकि इससे शरीर को हर प्रकार से पौष्टिकता मिलती है.

भोजन लेने का काल: जब जठराग्नि अच्छी तरह प्रदीप्त होती है तब ही भोजन करना चाहिए. दूसरे शब्दों में भोजन लेने का सही समय तब है जब ज़ोर से भूख लगी हो. बिना भूख के भोजन नही खाना चाहिए. वस्तुतः सुबह का भोजन 8-9 बजे (8-9 A.M.) तक हो जाना चाहिए. 10 बजे (10 A.M.) के बाद भोजन न लें. दोपहर का भोजन 12-2 (12:00- 2:00 P.M.) बजे के बीच ले लीजिए. क्योंकि यह पित्त का काल है इसलिए यह दिन का सबसे बड़ा, भारी भोजन होना चाहिए. रात्रि का भोजन 6-8 बजे(6:00-8:00 P.M.)के बीच कर लीजिए और यह हल्का और सुपाच्य ही होना चाहिए. रात्रि 9 बजे के बाद भोजन बिल्कुल न लें.

वास्तव में भोजन लेने का उचित काल सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य है. सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद कुछ भी खाएँगे तो वह पचता नही बल्कि पक्वाशय में सड़न उत्पन्न करता है. इसलिए रात्रि को ना खाएँ.
भोजन उतना ही लें जिससे आपका आधा पेट भर जाए. एक चौथाई जल के लिए रखीए और बाकी का तीनों दोषों और हवा के लिए होना चाहिए. इसलिए कभी भी पेट भर के भोजन ना करें. ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.
  • सर्वप्रथम मधुर रस के भोजन जैसे कि मीठी सब्जी, मिठाई इत्यादि का सेवन करना चाहिए. तत्पश्चात आम्ल और लवणीय भोजन को खाएँ. अंत में कसैले, कड़वे और कशाय भोजन का सेवन करना चाहिए.
  • भोजन ग्रहण करने से पहले और बाद में हाथ, पाँव और मुख को धो लेना चाहिए.
  • अच्छा रहे यदि आप एक सॉफ-सुथरी जगह में एकांकी होकर भोजन ग्रहण करें. या फिर उन लोगों के साथ बैठकर भोजन करें जिसका साथ प्रेमयुक्त और मधुर है. क्रोधी और कटु शब्द बोलने वालों के साथ बैठकर भोजन नही करना चाहिए.
  • प्रेम से बनाया हुआ भोजन ही सेवन करना स्वास्थ्य के लिए हितकर है. यदि खाना बनाने वाले के मन में कटुता और नकारात्मक विचार भरे है तो वह भोजन खाने से शरीर और मन में रोग उत्पन्न होते है.
    अगला भोजन तभी लें जब पिछला खाया हुआ पूर्णतया पच गया हो.
  • भोजन के एक ग्रास को 32 बार चबाना चाहिए. सबसे पहले कठोर पदार्थों का सेवन कीजिए. उसके बाद रस-युक्त और तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए.
  • भोजन खाते समय पानी नही पीना चाहिए. इससे पाचक अग्नि मंद पड़ जाती है. भोजन लेते समय पानी का इस्तेमाल विवेक पूर्वक ही करें. भोजन खा लेने के कम-से-कम 1 घंटे तक जल का सेवन नही करना चाहिए.
  • अधिक गर्म भोजन के सेवन से कमज़ोरी आती है. जबकि ठंडे और बासी भोजन को पचाने के लिए से पाचन तंत्र को अधिक श्रम करना पड़ता ही. इससे अपच भी होता है.
  • अधिक देर तक या तेज़ आँच पर पकाए भोजन को खाने से ग्लानि आती है. भोजन कम आँच पर पका कर रूचि पूर्ण रूप से बनाना चाहिए.
  • भोजन करने से पहले प्रार्थना द्वारा ईश्वर को अर्पण करके ही भोजन प्राप्त करना चाहिए. इससे भोजन में व्याप्त नकारात्मक उर्जा व्यक्ति को प्रभावित नही करती.

    भोजन को बनाने और छकने का ढंग भी इससे मिलने वाले पोषण को निर्धारित करता है. यदि आप उचित आहार से बना हुआ भोजन अनुचित समय और तरीके से लेते हैं तो भी आपको भोजन से लाभ की जगह गॅस, अपच इत्यादि समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है.
  • सर्वप्रथम भोजन एकांत में या सात्विक और प्रीतिकार संगति में ही कीजिए. फल को मुख्य भोजन से या तो 1 घंटा पहले खाएँ अथवा 2 घंटे बाद ही खाएँ. यदि आप साथ में फल खाते है तो आपको गॅस हो सकती है.
  • दक्षिण की ओर मुख करके खाना नही खाना चाहिए. पूर्व की तरफ मुख रखकर भोजन सेवन करें.
  • भोजन करने के बाद 100 कदम अवश्य चलें.
  • भोजन के 1-2 घंटे तक व्यायाम या मैथुन ना करें.
  • जब अत्यधिक प्यास लगी हो तो पहले पानी द्वारा इसे मिटाए. इसके 1 घंटे बाद ही खाने खाएँ.
  • बहुत थकान होने पर भी भोजन नही लेना चाहिए. विश्राम के बाद ही भोजन ग्रहण करें.
  • भूख लगने पर ही क्षुधा शांत करें.
  • भूख लगने पर भोजन अवश्य खा लें कयकी ना खाने से शरीर में कमज़ोरी आती और मस्तिष्क की कार्यशक्ति भी घट जाती है, हृदय रोग भी हो जाता हैं. कुछ लोगों को चक्कर भी आने लगते है. 
  • हमारे भोजन में यदि इन नौ गुणों का समन्वय, सामंजस्य और पूर्ति हो तो एक संतुलित आहार बनता है. ये देखने, खाने में रुचिकार, पाचक और पुष्टिवर्धक होता है. नौ गुण इस प्रकार हैं:
    1. वर्ण : भोजन की रंगत.
    2. प्रसाद: भोजन को देखने और खाने से अनद की अनुभूति होना.
    3. सुखम: आरामदायक और पुष्टि प्रदायक गुण.
    4. संतुष्टि: भोजन ग्रहण करने के पश्चात संतुष्टि का अनुभव होता है.
    5. सौस्वरयम: आपको हैरानी होगी लेकिन भोजन में भी लयात्मकता होनी चाहिए. हर शाख के साथ प्रयोग होने वाले उचित मसाले होते हैं या भोजन को पकने की विधि का तदात्मय भी आवश्यक है.
    6. पुष्टि: भोजन द्वारा पुष्टि की प्राप्ति.
    7. प्रतिभा: कौशल या योग्यता में कितनी वृद्धि करता है.
    8. मेध: बुद्धि.
    9. बल:  रोग प्रतिकारक शक्ति और पुष्टि.

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